Tuesday, 29 December 2015

बैमानी हुई कुछ ऐसी कि ........

मोड़ लू मुह तेरे अक्स से भी ,
पर मेरी आँखों की जंजीरें तेरे हाथों में है ....
रिहा कर दू तुझको अपनी यादों से भी ,
पर तेरे एहसास की खुशबू मेरे ख्वाबों में है .....
हुआ है ये हिसाब ही कुछ ऐसे कि ,
खो गई है मेरी नींद भी ,
और तेरी तस्वीर सिरहाने के पास में है .....
की है रंजिश इरादों ने हिम्मत से ,
हुई है साजिश जस्बातों के पैमानों से ,
देखि है मन्नत उस मज़ार में कुछ ऐसे कि ,
नाम है लिखा तेरा भी ,
और स्याही लगी मेरे हाथ में है .....
पिरोई है काँटों की माला अपने हाथों से ,
बिखेरी है खुशियों की रंगोली अपने क़दमों से ,
किया है अपना हाल कुछ ऐसे कि ,
मुरझा गईं हैं हसरतें फिर भी ,
तेरे चेहरे का नूर मेरी आँखों में है ........

Sunday, 27 December 2015

इन टूटी नींदों की आंधी में

इन टूटी नींदों की आंधी में
आँखों में बारिश बाकी है,
और तुम मुझसे कहती हो
अभी रात साँवली बाकी है । 
भटक रही इस मंजिल में
उधड़ी राह अन्धराई है,
और तुम मुझसे कहती हो
अभी दिया जलाना बाकी है ।
बे मतलभ की उलझी तकरारों में
हर सच से मेरी लड़ाई है,
और तुम मुझसे कहती हो
एक बात पुरानी बाकी है  । 
भूल न जाने की फ़िक्र में
तुमने सौ कसमे खिलवाई है,
और फिर भी तुम मुझसे कहती हो
अभी ये याद दिलाना बाकी है  । 
हर शाम तुम्हारी मोहब्बत में
मेरे हाथ लगी सिर्फ तन्हाई है,
और तुम मुझसे कहती हो
अभी तो दिल दुखाना बाकि है ।  

Saturday, 26 December 2015

तेरी झुकती हुई नज़र

तेरी झुकती हुई नज़र पे
जो मेरी नज़र पड़ जाए ,
ढलते हुए सूरज से मानो,
फलक मिल जाए !!!

हवा जो हटा दे
इन जुल्फों को चेहरे से ,
चाँद पे जो दो चार दाग हैं,
वो भी हट जाए !!!

पनघट पे जो
छु ले तेरी कमर को ,
नदी उसी ,
मोड़ को मुड़ जाए !!!

क्या खुशनसीबी रहेगी
मेरी उस मंज़र पे ,
जब तेरे लफ्जों से
मेरा नाम मिल जाए !!!


मुमकिन है ये वाकिया 'आशु'
इक रोज़ मुक़र्रर हो जाए,,
तू निकले अँधेरे में घर से ,
और हर एक जुगनू सितारा हो जाए !!!

ख्वाहिशों के बाजार में

ख्वाहिशों के बाज़ार में
जूनून कुछ कम है ,
परिंदे अब शाखों में ज्यादा
आसमानों में कम हैं !!!

हर तक्कल्लुफ़ के पीछे
खुदगर्जी छिपी है ,
इखलास अब चेहरों में ज्यादा
ज़ेहन में कम है !!!

तमाम उलझनों में ढका
ठहरा सा मन है ,
पानी अब आँखों में ज्यादा
बारिशों में कम है !!!

बेबस नज़र आती हैं
उसे कोशिशे अपनी ,
शिद्दतें अब आंधियो में ज्यादा
होसलों में कम है !!!

बेरहम हो रहा है
दौर-ऐ-तरक्की भी ,
इंसानियत अब कस्बों में ज्यादा
शहरों में कम है !!!

राह-ऐ-मंजिल में
'आशु' अब रुकें तो कहाँ ,
सहारे अब मयखानों में ज्यादा
मकानों में कम हैं !!!