Saturday, 26 December 2015

ख्वाहिशों के बाजार में

ख्वाहिशों के बाज़ार में
जूनून कुछ कम है ,
परिंदे अब शाखों में ज्यादा
आसमानों में कम हैं !!!

हर तक्कल्लुफ़ के पीछे
खुदगर्जी छिपी है ,
इखलास अब चेहरों में ज्यादा
ज़ेहन में कम है !!!

तमाम उलझनों में ढका
ठहरा सा मन है ,
पानी अब आँखों में ज्यादा
बारिशों में कम है !!!

बेबस नज़र आती हैं
उसे कोशिशे अपनी ,
शिद्दतें अब आंधियो में ज्यादा
होसलों में कम है !!!

बेरहम हो रहा है
दौर-ऐ-तरक्की भी ,
इंसानियत अब कस्बों में ज्यादा
शहरों में कम है !!!

राह-ऐ-मंजिल में
'आशु' अब रुकें तो कहाँ ,
सहारे अब मयखानों में ज्यादा
मकानों में कम हैं !!!

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