कल शाम ढलते ही सिनेमा (ख्वाब) देखने मै अपने कमरे पर गया। दरवाजे पर खड़े टिकट चेकर (वक्त) को मैंने अपनी टिकट (थकान) दिखाई। उसने मेरी तलाशी लेने के लिए ज़ेब टटोली तो उसे (ख़ुशी) और (सफलता) जैसी कोई हानि पहुचाने वाली चीज़ नहीं मिली, हाँ दो बेकार (कोशिश) के सिक्के पड़े थे जिस पर उसे कोई आपत्ति नहीं थी। जैसे ही उसने मेरी पीछे की ज़ेब की तलाशी ली, उसे (४ दिन की मुहब्बत) मिली जिसे देख कर टिकट चेकर (वक्त) मोटी आवाज़ में बोला ; आप इसे साथ नहीं ले जा सकते ! मैंने कहा चलो कोई नहीं इसे इधर ही छोड़कर चला जाता हूँ, जैसे ही मेरा सिनेमा (ख्वाब) पूरा हो जाएगा वापस आकर मै इसे पा लूँगा। (वक्त) बोला देखो जैसी तुम्हारी मर्ज़ी ! अपनी ज़िम्मेदारी पर छोड़कर जाओ। मै उसे वही छोडकर अन्दर सिनेमा (ख्वाब) देखने चल दिया और जाकर अपने बिस्तर पर लेट गया। (पलकों के) परदे गिर गए थे पर ख्वाब सिनेमा शुरू नहीं हुआ, कुछ देर बाद ही तेज़ रौशनी के साथ सिनेमा शुरू हो गया। जैसे जैसे (दिमाग) की रील घूमती गई सिनेमा बढता गया। शुरुआत में जैसे ही हीरो (स्वाभिमान) की एंट्री हुई उसका अंदाज़ देखकर मेरे रोंगटे, खड़े होकर सीटी बजाने को उत्साहित हो गए। क्या अंदाज़ था ! एकदम मरदाना। जिस तरीके से वो (उदासी) और (हताशा) जैसे बड़े बड़े विलेन का अपने धैर्य से सामना कर रहा था काबिले तारीफ था। फिर एक रोज़ उसकी मुलाकात एक खुबसूरत सी लड़की (उन्नति) से हुई। उसकी सुन्दरता और चमक को देखकर स्वाभिमान पहली ही नज़र में उसे अपना दिल दे बैठा। उन्नति दिखती तो बहुत खुबसूरत थी पर उसके दिल में क्या है, ये कोई नहीं जानता था। स्वाभिमान उसे पाने के लिए कुछ भी करने को तय्यार हो चूका था। उन्नति को स्वाभिमान अच्छा तो लगा, पर उसे वो अपनाने के लिए तय्यार नहीं थी। उनत्ती ना मिलने पर स्वाभिमान को बड़ा धक्का लगा। इस ठोकर ने उसे पूरी तरह बदल दिया। वो किसी भी तरीके से उन्नति को पाना चाहता था उसके लिए उसने उन्नति का पीछा शुरू कर दिया। उसको मालूम चला की उसे तो (बेईमान) और (चापलूस) जैसे लडके पसंद हैं। फिर क्या था स्वाभिमान ने खुद को बदलना शुरू कर दिया। शुरुआत उसके लिए थोड़ी मुश्किल जरूर हुई, पर उन्नति को पाने के लिए वो उस रस्ते पर चलता चला गया। उनत्ती को उसका बदलता स्वाभाव पसंद आने लगा वो उसकी तरफ आकर्षित होती चली गई। उन्नति को अपने करीब आता देख स्वाभिमान बहुत खुश था। उन्नति अब उसके साथ साथ चलने लगी थी। प्यार से वो उसे अब (अभिमान) बुलाती थी। ज़िन्दगी सही चल रही थी पर उन्नति के दिल में क्या है, ये तो कोई नहीं जानता था। धीरे धीरे दोनों में अनबन होने लगी। और एक दिन आया जब उन्नति स्वाभिमान को छोड़कर फिर चली गई। इस बार स्वाभिमान खुद को संभाल ना सका। वो खुद में ही कही टूट चूका था। (उदासी) और (हताशा) जैसे विलेन फिर से उस से टकराए पर इस बार वो उनका सामना ना कर सका, और हार कर उसने आत्मसमर्पण कर दिया।
सिनेमा (ख्वाब) के ऐसे भयानक अंत की मुझे कोई उम्मीद नहीं थी। पलकों के परदे हटते ही, मै अचानक बिस्तर से उठ खड़ा हुआ और कमरे से बाहर निकल गया। बाहर आते ही मैंने टिकट चेकर (वक्त) को ढूंडा, पर वो वहां नहीं मिला और ना ही मेरी वो (४ दिन की मोहब्बत) फिर कभी मिली ।। .......
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