Tuesday, 21 November 2017

असलियत

रंजिश ये मेरे साथ हर रोज़ हो जाती है ,
जब तक समझता हूँ उजालों की असलियत
शाम हो जाती है !!

नाराज़ वक्त में ज़िन्दगी आईना हो जाती है ,
दोस्ती जागती है रात भर साथ में
आशिक़ी सो जाती है !!

दौलत के जूनून से अय॒याशी भी हार जाती है ,
अमीरी जागती है रात भर फ़िक्र में
गरीबी भूखी सो जाती है !!

हालातों के बदलते ही फितरत बदल जाती है
जैसे ही ढलता है सूरज शाम को
परछाई खो जाती है !!

कुछ अभी भी बाकी है

कुछ अश्क पलकों पे  ,
कुछ लफ्ज़ होटों पे बाकी हैं
कुछ हर्फ़ बाकी हैं लिखने
को यादें पुरानी
वो कहानी
तुम्हारी मनमानी
अभी भी बाकी हैं !!
कहता था मै जो रातों से
वो शिकवे
कहती थी तुम जो सितारों से
वो शिकायतें
उन जागी रातों के सवेरे बाकी हैं !!
ढूंडता था मै जिसे धुप में
मांगती थी तुम जिसे अक्सर दुआओं में
वो बारिश की बुँदे बाकी हैं !!
लौट आना तुम जाओ जहाँ
वो भरोसे में शिकंद बाकी हैं
मेरा इंतजार बाकी है
तुम्हारी तड़प बाकी है
अब बस ये उम्र जी रही है
जिसे ढलना बाकी है !!
अब इस जिस्म को मै बेच भी दूं
इस दुनिया में लेकिन
इन आँखों में तेरी
आंखिरी झलक बाकी है !!
अब छोड़ भी दो मुझे
क्यों सताते हो इतना
तुम्हारी यादें तो नहीं हैं
पर ये क्या है जो बाकी है !!

मेरी परिभाषा

अपनी ख्वाहिशों को अपना
किरदार बनाता है ,
मै वो बादल हूँ
जो चाँद के दाग छुपाता है !!

आंधियों के साए में जब
ढल जाते हैं पत्ते ,
मै वो डाल हूँ
जो दामन छुपाता है !!

हर उम्र बदलते
ज़िन्दगी के मौसम में ,
मै वो धूप हूँ
जो बर्फ के पैर सुखाता है !!

माना कि हुस्न का लिबास
कुछ कम है जिस्म में ,
पर मै वो काजल हूँ
जो नज़रें चुराता है !!

यादों की फेहरिस्त चाहे
लम्बी हो बहुत ,
मै वो लम्हा हूँ
जो हस्ता आंसू गिराता है !!

हर कदम डूबते
सफ़र-ऐ-मंजिल में ,
मै वो चराग हूँ
जो अंधेरे को रास्ता दिखाता है !!

महफ़िल, तन्हाई, इश्क जुदाई
के आलम में
'आशु' वो जाम है
जो बहकना सिखाता है !!

बेचैनिया ओढ़कर, गुज़रती हैं रातें

बेचैनिया ओढ़कर, गुज़रती हैं रातें
नींदों से अब कहाँ होती हैं मुलाकातें !!

सुबह कुछ हिम्मतें बटोरती हैं,
तो शामें खाली ज़ेब टटोलती हैं !!
ख्वाहिशों की महफिलों में अक्सर,
सिर्फ ज़रूरतें ही बोलती हैं !!

ख्वाब बिस्तर पर पड़े हैं, और सिरहाने में यादें,
बेचैनिया ओढ़कर, गुज़रती हैं रातें !!

न किसी की तकलीफ़ का कोई एहसास है,
न किसी की ख़ुशी किसी को रास है !!
अपनी ही खुदगर्ज़ी में डूबी न जाने,
ये कैसी इस ज़माने की प्यास है !!

बेज़बाँ धडकनें रातभर, करती हैं खामोश बातें,
बेचैनिया ओढ़कर, गुज़रती हैं रातें !!

दौर-ऐ-मोहब्बत भी नियत और 
जूनूनियत का ताल-मेल बन कर रह गयी,
कभी हमें याद किया, कभी हमने याद किया
आशिकी हिचकियों का खेल बन कर रह गयी 

अश्कों की कतारों से सजी हैं, उम्मीदों की बारातें, 
बेचैनिया ओढ़कर, गुज़रती हैं रातें !!