Tuesday, 21 November 2017

बेचैनिया ओढ़कर, गुज़रती हैं रातें

बेचैनिया ओढ़कर, गुज़रती हैं रातें
नींदों से अब कहाँ होती हैं मुलाकातें !!

सुबह कुछ हिम्मतें बटोरती हैं,
तो शामें खाली ज़ेब टटोलती हैं !!
ख्वाहिशों की महफिलों में अक्सर,
सिर्फ ज़रूरतें ही बोलती हैं !!

ख्वाब बिस्तर पर पड़े हैं, और सिरहाने में यादें,
बेचैनिया ओढ़कर, गुज़रती हैं रातें !!

न किसी की तकलीफ़ का कोई एहसास है,
न किसी की ख़ुशी किसी को रास है !!
अपनी ही खुदगर्ज़ी में डूबी न जाने,
ये कैसी इस ज़माने की प्यास है !!

बेज़बाँ धडकनें रातभर, करती हैं खामोश बातें,
बेचैनिया ओढ़कर, गुज़रती हैं रातें !!

दौर-ऐ-मोहब्बत भी नियत और 
जूनूनियत का ताल-मेल बन कर रह गयी,
कभी हमें याद किया, कभी हमने याद किया
आशिकी हिचकियों का खेल बन कर रह गयी 

अश्कों की कतारों से सजी हैं, उम्मीदों की बारातें, 
बेचैनिया ओढ़कर, गुज़रती हैं रातें !!


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