Saturday, 8 August 2020

मश्ग़ला

मेरे कमरे में दो खिड़कियाँ थी | एक थोड़ी बड़ी थी , कमरे में रोशनी भी ज़्यादा करती थी | मुझे लगता था की दूसरी खिड़की कमरे की शो ख़राब ही कर रही है | फिर एक दिन घर में अलमारी आई तो मैंने उसे छोटी खिड़की के सामने लगा दिया जिससे की कमरे की शो मुझे अपने हिसाब की ठीक लगे | कई साल बीत गए कमरा वैसा ही दिखा | अभी कुछ दिन पहले घर में एक पूजा थी जो इसी कमरे में होनी थी | कमरे की सफाई और पूजा की व्यवस्था के लिए अलमारी हटाई गयी और उस छोटी खिड़की को खोला गया | उस छोटी खिड़की ने खुल कर कमरा पहले से ज़्यादा ख़ूबसूरत कर दिया | कमरे में रोशनी तो लगभग वैसी ही थी पर ताज़गी पहले से ज़्यादा थी | मुझे पहले के समय की याद आने लगी और उसी के साथ मै उस उम्र उस वक्त में चला गया जब मै इसी कमरे में वर्तमान से ज़्यादा खुश और मानसिक रूप से ज़्यादा स्वस्थ हुआ करता था | हमारे दिमाग में ऐसी तमाम खिड़कियाँ होती हैं जिनको हम खुद कई समय पहले खुद के लिए बंद कर देते हैं क्यों की उनकी उपस्तिथि का प्रभाव हम उस वक्त अनुभव नहीं कर पाते हैं | पर उनका महत्व होता है और वह समय के साथ ही समझ आता है | कभी अवसर आने पर वह बंद पड़ी खिड़की नज़र आये तो उसको खोल लिया कीजिए जीवन में रोशनी तो लगभग वैसी ही रहेगी पर ताज़गी पहेले से ज़्यादा आ जाएगी |



Wednesday, 17 January 2018

ख्वाब सिनेमा


कल शाम ढलते ही सिनेमा (ख्वाब) देखने मै अपने कमरे पर गया। दरवाजे पर खड़े टिकट चेकर (वक्त) को मैंने अपनी टिकट (थकान) दिखाई। उसने मेरी तलाशी लेने के लिए ज़ेब टटोली तो उसे (ख़ुशी) और (सफलता) जैसी कोई हानि पहुचाने वाली चीज़ नहीं मिली, हाँ दो बेकार (कोशिश) के सिक्के पड़े थे जिस पर उसे कोई आपत्ति नहीं थी। जैसे ही उसने मेरी पीछे की ज़ेब की तलाशी ली, उसे (४ दिन की मुहब्बत) मिली जिसे देख कर टिकट चेकर (वक्त) मोटी आवाज़ में बोला ; आप इसे साथ नहीं ले जा सकते ! मैंने कहा चलो कोई नहीं इसे इधर ही छोड़कर चला जाता हूँ, जैसे ही मेरा सिनेमा (ख्वाब) पूरा हो जाएगा वापस आकर मै इसे पा लूँगा। (वक्त) बोला देखो जैसी तुम्हारी मर्ज़ी ! अपनी ज़िम्मेदारी पर छोड़कर जाओ। मै उसे वही छोडकर अन्दर सिनेमा (ख्वाब) देखने चल दिया और जाकर अपने बिस्तर पर लेट गया। (पलकों के) परदे गिर गए थे पर ख्वाब सिनेमा शुरू नहीं हुआ, कुछ देर बाद ही तेज़ रौशनी के साथ सिनेमा शुरू हो गया। जैसे जैसे (दिमाग) की रील घूमती गई सिनेमा बढता गया। शुरुआत में जैसे ही हीरो (स्वाभिमान) की एंट्री हुई उसका अंदाज़ देखकर मेरे रोंगटे, खड़े होकर सीटी बजाने को उत्साहित हो गए। क्या अंदाज़ था ! एकदम मरदाना। जिस तरीके से वो (उदासी) और (हताशा) जैसे बड़े बड़े विलेन का अपने धैर्य से सामना कर रहा था काबिले तारीफ था। फिर एक रोज़ उसकी मुलाकात एक खुबसूरत सी लड़की (उन्नति) से हुई। उसकी सुन्दरता और चमक को देखकर स्वाभिमान पहली ही नज़र में उसे अपना दिल दे बैठा। उन्नति दिखती तो बहुत खुबसूरत थी पर उसके दिल में क्या है, ये कोई नहीं जानता था। स्वाभिमान उसे पाने के लिए कुछ भी करने को तय्यार हो चूका था। उन्नति को स्वाभिमान अच्छा तो लगा, पर उसे वो अपनाने के लिए तय्यार नहीं थी। उनत्ती ना मिलने पर स्वाभिमान को बड़ा धक्का लगा। इस ठोकर ने उसे पूरी तरह बदल दिया। वो किसी भी तरीके से उन्नति को पाना चाहता था उसके लिए उसने उन्नति का पीछा शुरू कर दिया। उसको मालूम चला की उसे तो (बेईमान) और (चापलूस) जैसे लडके पसंद हैं। फिर क्या था स्वाभिमान ने खुद को बदलना शुरू कर दिया। शुरुआत उसके लिए थोड़ी मुश्किल जरूर हुई, पर उन्नति को पाने के लिए वो उस रस्ते पर चलता चला गया। उनत्ती को उसका बदलता स्वाभाव पसंद आने लगा वो उसकी तरफ आकर्षित होती चली गई। उन्नति को अपने करीब आता देख स्वाभिमान बहुत खुश था। उन्नति अब उसके साथ साथ चलने लगी थी। प्यार से वो उसे अब (अभिमान) बुलाती थी। ज़िन्दगी सही चल रही थी पर उन्नति के दिल में क्या है, ये तो कोई नहीं जानता था। धीरे धीरे दोनों में अनबन होने लगी। और एक दिन आया जब उन्नति स्वाभिमान को छोड़कर फिर चली गई। इस बार स्वाभिमान खुद को संभाल ना सका। वो खुद में ही कही टूट चूका था। (उदासी) और (हताशा) जैसे विलेन फिर से उस से टकराए पर इस बार वो उनका सामना ना कर सका, और हार कर उसने आत्मसमर्पण कर दिया।
सिनेमा (ख्वाब) के ऐसे भयानक अंत की मुझे कोई उम्मीद नहीं थी। पलकों के परदे हटते ही, मै अचानक बिस्तर से उठ खड़ा हुआ और कमरे से बाहर निकल गया। बाहर आते ही मैंने टिकट चेकर (वक्त) को ढूंडा, पर वो वहां नहीं मिला और ना ही मेरी वो (४ दिन की मोहब्बत) फिर कभी मिली ।। .......

Tuesday, 21 November 2017

असलियत

रंजिश ये मेरे साथ हर रोज़ हो जाती है ,
जब तक समझता हूँ उजालों की असलियत
शाम हो जाती है !!

नाराज़ वक्त में ज़िन्दगी आईना हो जाती है ,
दोस्ती जागती है रात भर साथ में
आशिक़ी सो जाती है !!

दौलत के जूनून से अय॒याशी भी हार जाती है ,
अमीरी जागती है रात भर फ़िक्र में
गरीबी भूखी सो जाती है !!

हालातों के बदलते ही फितरत बदल जाती है
जैसे ही ढलता है सूरज शाम को
परछाई खो जाती है !!

कुछ अभी भी बाकी है

कुछ अश्क पलकों पे  ,
कुछ लफ्ज़ होटों पे बाकी हैं
कुछ हर्फ़ बाकी हैं लिखने
को यादें पुरानी
वो कहानी
तुम्हारी मनमानी
अभी भी बाकी हैं !!
कहता था मै जो रातों से
वो शिकवे
कहती थी तुम जो सितारों से
वो शिकायतें
उन जागी रातों के सवेरे बाकी हैं !!
ढूंडता था मै जिसे धुप में
मांगती थी तुम जिसे अक्सर दुआओं में
वो बारिश की बुँदे बाकी हैं !!
लौट आना तुम जाओ जहाँ
वो भरोसे में शिकंद बाकी हैं
मेरा इंतजार बाकी है
तुम्हारी तड़प बाकी है
अब बस ये उम्र जी रही है
जिसे ढलना बाकी है !!
अब इस जिस्म को मै बेच भी दूं
इस दुनिया में लेकिन
इन आँखों में तेरी
आंखिरी झलक बाकी है !!
अब छोड़ भी दो मुझे
क्यों सताते हो इतना
तुम्हारी यादें तो नहीं हैं
पर ये क्या है जो बाकी है !!

मेरी परिभाषा

अपनी ख्वाहिशों को अपना
किरदार बनाता है ,
मै वो बादल हूँ
जो चाँद के दाग छुपाता है !!

आंधियों के साए में जब
ढल जाते हैं पत्ते ,
मै वो डाल हूँ
जो दामन छुपाता है !!

हर उम्र बदलते
ज़िन्दगी के मौसम में ,
मै वो धूप हूँ
जो बर्फ के पैर सुखाता है !!

माना कि हुस्न का लिबास
कुछ कम है जिस्म में ,
पर मै वो काजल हूँ
जो नज़रें चुराता है !!

यादों की फेहरिस्त चाहे
लम्बी हो बहुत ,
मै वो लम्हा हूँ
जो हस्ता आंसू गिराता है !!

हर कदम डूबते
सफ़र-ऐ-मंजिल में ,
मै वो चराग हूँ
जो अंधेरे को रास्ता दिखाता है !!

महफ़िल, तन्हाई, इश्क जुदाई
के आलम में
'आशु' वो जाम है
जो बहकना सिखाता है !!

बेचैनिया ओढ़कर, गुज़रती हैं रातें

बेचैनिया ओढ़कर, गुज़रती हैं रातें
नींदों से अब कहाँ होती हैं मुलाकातें !!

सुबह कुछ हिम्मतें बटोरती हैं,
तो शामें खाली ज़ेब टटोलती हैं !!
ख्वाहिशों की महफिलों में अक्सर,
सिर्फ ज़रूरतें ही बोलती हैं !!

ख्वाब बिस्तर पर पड़े हैं, और सिरहाने में यादें,
बेचैनिया ओढ़कर, गुज़रती हैं रातें !!

न किसी की तकलीफ़ का कोई एहसास है,
न किसी की ख़ुशी किसी को रास है !!
अपनी ही खुदगर्ज़ी में डूबी न जाने,
ये कैसी इस ज़माने की प्यास है !!

बेज़बाँ धडकनें रातभर, करती हैं खामोश बातें,
बेचैनिया ओढ़कर, गुज़रती हैं रातें !!

दौर-ऐ-मोहब्बत भी नियत और 
जूनूनियत का ताल-मेल बन कर रह गयी,
कभी हमें याद किया, कभी हमने याद किया
आशिकी हिचकियों का खेल बन कर रह गयी 

अश्कों की कतारों से सजी हैं, उम्मीदों की बारातें, 
बेचैनिया ओढ़कर, गुज़रती हैं रातें !!


Tuesday, 29 December 2015

बैमानी हुई कुछ ऐसी कि ........

मोड़ लू मुह तेरे अक्स से भी ,
पर मेरी आँखों की जंजीरें तेरे हाथों में है ....
रिहा कर दू तुझको अपनी यादों से भी ,
पर तेरे एहसास की खुशबू मेरे ख्वाबों में है .....
हुआ है ये हिसाब ही कुछ ऐसे कि ,
खो गई है मेरी नींद भी ,
और तेरी तस्वीर सिरहाने के पास में है .....
की है रंजिश इरादों ने हिम्मत से ,
हुई है साजिश जस्बातों के पैमानों से ,
देखि है मन्नत उस मज़ार में कुछ ऐसे कि ,
नाम है लिखा तेरा भी ,
और स्याही लगी मेरे हाथ में है .....
पिरोई है काँटों की माला अपने हाथों से ,
बिखेरी है खुशियों की रंगोली अपने क़दमों से ,
किया है अपना हाल कुछ ऐसे कि ,
मुरझा गईं हैं हसरतें फिर भी ,
तेरे चेहरे का नूर मेरी आँखों में है ........

Sunday, 27 December 2015

इन टूटी नींदों की आंधी में

इन टूटी नींदों की आंधी में
आँखों में बारिश बाकी है,
और तुम मुझसे कहती हो
अभी रात साँवली बाकी है । 
भटक रही इस मंजिल में
उधड़ी राह अन्धराई है,
और तुम मुझसे कहती हो
अभी दिया जलाना बाकी है ।
बे मतलभ की उलझी तकरारों में
हर सच से मेरी लड़ाई है,
और तुम मुझसे कहती हो
एक बात पुरानी बाकी है  । 
भूल न जाने की फ़िक्र में
तुमने सौ कसमे खिलवाई है,
और फिर भी तुम मुझसे कहती हो
अभी ये याद दिलाना बाकी है  । 
हर शाम तुम्हारी मोहब्बत में
मेरे हाथ लगी सिर्फ तन्हाई है,
और तुम मुझसे कहती हो
अभी तो दिल दुखाना बाकि है ।  

Saturday, 26 December 2015

तेरी झुकती हुई नज़र

तेरी झुकती हुई नज़र पे
जो मेरी नज़र पड़ जाए ,
ढलते हुए सूरज से मानो,
फलक मिल जाए !!!

हवा जो हटा दे
इन जुल्फों को चेहरे से ,
चाँद पे जो दो चार दाग हैं,
वो भी हट जाए !!!

पनघट पे जो
छु ले तेरी कमर को ,
नदी उसी ,
मोड़ को मुड़ जाए !!!

क्या खुशनसीबी रहेगी
मेरी उस मंज़र पे ,
जब तेरे लफ्जों से
मेरा नाम मिल जाए !!!


मुमकिन है ये वाकिया 'आशु'
इक रोज़ मुक़र्रर हो जाए,,
तू निकले अँधेरे में घर से ,
और हर एक जुगनू सितारा हो जाए !!!

ख्वाहिशों के बाजार में

ख्वाहिशों के बाज़ार में
जूनून कुछ कम है ,
परिंदे अब शाखों में ज्यादा
आसमानों में कम हैं !!!

हर तक्कल्लुफ़ के पीछे
खुदगर्जी छिपी है ,
इखलास अब चेहरों में ज्यादा
ज़ेहन में कम है !!!

तमाम उलझनों में ढका
ठहरा सा मन है ,
पानी अब आँखों में ज्यादा
बारिशों में कम है !!!

बेबस नज़र आती हैं
उसे कोशिशे अपनी ,
शिद्दतें अब आंधियो में ज्यादा
होसलों में कम है !!!

बेरहम हो रहा है
दौर-ऐ-तरक्की भी ,
इंसानियत अब कस्बों में ज्यादा
शहरों में कम है !!!

राह-ऐ-मंजिल में
'आशु' अब रुकें तो कहाँ ,
सहारे अब मयखानों में ज्यादा
मकानों में कम हैं !!!